मीर बाक़िर अली दास्तान गो — मुकम्मल मज़मून
(मुसन्निफ़: शाहिद अहमद देहलवी)
दिल्ली क्या उजड़ी, कला और कलावंतों का ख़ात्मा ही हो गया। एक-एक करके वह सब साहिबान-ए-कमाल उठ गए जिनकी बदौलत दिल्ली, दिल्ली थी। इन्हीं नामवरों में एक ज़ात मीर बाक़िर अली दास्तान गो की थी। वह दिल्ली के ही नहीं, बल्कि हिन्दुस्तान के आख़िरी दास्तान गो थे। उनके बाद दास्तान गोई का चराग़ हमेशा के लिए गुल हो गया।
हुलिया और वज़अ़दारी
मीर साहब का हुलिया भी बड़ा अजीब और दिलकश था। लंबा क़द, इकहरा बदन, बड़ी-बड़ी आखें, चेहरे पर ज़रा सी दाढ़ी और सर पर दिल्ली की ख़ास दो-पल्ली टोपी। बदन पर साफ़-सुथरा कुर्ता और अचकन, नीचें चूड़ीदार पाजामा और पांव में दिल्ली का ज़री का जूता। वह जब चलते थे तो उनकी गर्दन हमेशा सीधी रहती थी। बुढ़ापे और ग़ुर्बत (ग़रीबी) में भी उनकी रीढ़ की हड्डी में लचक नहीं आई थी। दूर से देखकर ही मालूम हो जाता था कि कोई शरीफ़ और वज़अ़दार देहलवी जा रहा है।
दास्तान गोई का कमाल
मीर साहब सिर्फ़ कहानी नहीं सुनाते थे, बल्कि वह महफ़िल में एक जादू जगा देते थे। उनके पास लफ़्ज़ों का ऐसा ज़ख़ीरा था कि सुनने वाला दंग रह जाता। वह जब 'दास्तान-ए-अमीर हम्ज़ा' या 'तिलिस्म-ए-होशरुबा' सुनाने बैठते तो समां बांध देते थे।
उनकी दास्तान गोई में मुकम्मल अदाकारी (Acting) होती थी। अगर दास्तान में किसी जंग का ज़िक्र आता और तीर-ओ-तलवार चलने की बात होती, तो मीर साहब अपनी जगह से उठ खड़े होते। हाथ में मौजूद रूमाल को तलवार की तरह लहराते और मुंह से ऐसी आवाज़ें निकालते जैसे सचमुच दो नायाब तलवारें आपस में टकरा रही हों। घोड़ों की टाप का मंज़र बयान करना होता तो अपनी रानों पर हाथ मार-मार कर ऐसा समां बांधते कि सुनने वालों को लगता कि घोड़ों का एक लश्कर उनके बराबर से गुज़र रहा है।
इसके बरअक्स, अगर किसी बाग़ की ख़ूबसूरती, फूलों की महक या परियों के हुस्न का ज़िक्र आता, तो मीर साहब का लहजा इतना नर्म और सुरीला हो जाता कि महफ़िल में बैठे लोगों को अपनी चारों तरफ़ ख़ुशबू बिखरी हुई महसूस होने लगती थी।
नवाबों का दौर और मीर साहब की आन
एक ज़माना था जब दिल्ली के नवाब, अमीर-उमरा और लाल क़िले के शहज़ादे मीर साहब के क़दमों में बैठना अपनी ख़ुशक़िस्मती समझते थे। जिस महफ़िल में मीर साहब तशरीफ़ लाते, वहां उनके लिए ख़ास गाओ-तकिया लगाया जाता। उनके आगे हुक़्क़ा और पानदान सजा कर रखा जाता। मीर साहब बड़े नाज़-ओ-अंदाज़ से दास्तान शुरू करते थे।
उनका अदब और रोब ऐसा था कि दास्तान के दौरान किसी को खांसने या हुक़्क़े का कश ज़ोर से खींचने की इजाज़त नहीं थी। अगर कोई ज़रा सा भी बोल पड़ता, तो मीर साहब फ़ौरन दास्तान रोक देते और बड़ी संजीदगी से कहते: "मियां! पहले आप अपनी गुफ़्तगू मुकम्मल कर लें, या हुक़्क़ा पी लें, फिर हम अपनी दास्तान शुरू करेंगे।" बड़े से बड़ा नवाब भी फ़ौरन हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगता, तब जाकर मीर साहब दोबारा शुरू होते थे। दास्तान ख़त्म होने पर उन्हें अशर्फ़ियां, कीमती शालें और नक़द रुपए इनाम में मिलते थे।
ज़माने का फेर और ज़वाल
मगर अफ़सोस! ज़माना एक सा नहीं रहता। अंग्रेज़ों का राज मुकम्मल हुआ, दिल्ली की पुरानी तहज़ीब मटियामेट हो गई और नवाबों की रियासतें और जागीरें ख़त्म हो गईं। नई नस्ल अंग्रेज़ी पढ़-लिख कर "बाबू" बन गई। अब लोगों के पास न वह पुराना ज़ौक़ रहा اور न ही घंटों बैठ कर दास्तान सुनने का वक़्त। लोगों की दिलचस्पी थियेटर, सिनेमा और नई चीज़ों में बढ़ गई।
रफ़्ता-रफ़्ता मीर साहब की महफ़िलें वीरान होने लगीं। आमदनी का कोई दूसरा ज़रिया नहीं था। वह दास्तान गो जिसने शहंशाहों का दौर देखा था, अब तंगदस्ती और ग़रीबी के शिकंजे में कस गया। लेकिन मीर साहब बला के ख़ुद्दार और ग़ैरतमन्द इंसान थे। उन्होंने कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया اور न ही अपनी ग़रीबी का ढिंढोरा पीटा।
चूर्ण बेचने का दौर
जब पेट पालने की कोई राह न रही, तो मीर साहब ने दिल्ली की गलियों में घूम-फिर कर छोटी-मोटी चीज़ें और चूर्ण बेचना शुरू कर दिया। मगर यहां भी उनकी दिल्ली वाली वज़अ़दारी और शाहाना अंदाज़ बरक़रार रहा। वह आम फेरी वालों की तरह चीख़-चीख़ कर आवाज़ें नहीं लगाते थे। वह बहुत धीमी, संजीदगी और मद्धम आवाज़ में पुकारते थे:
"बच्चों का अम्रधारा... सफ़ा-चट चूर्ण..."
पुरानी दिल्ली के जो बुज़ुर्ग उनकी क़द्र और उनके कमाल से वाक़िफ़ थे, वह उन्हें देखकर तड़प उठते थे। वह चूर्ण ख़रीदने के बहाने मीर साहब को अपनी दुकान या ओटले पर बिठा लेते और गुज़ारिश करते: "मीर साहब! चूर्ण तो अपनी जगह है, ज़रा अपनी ज़बान से कोई छोटा सा क़िस्सा ही सुना दीजिए।" मीर साहब उनकी नीयत समझ जाते थे। वह मुस्कुराते, दो-चार मिनट का कोई लतीफ़ा या वाक़िया सुनाते, चूर्ण के पैसे लेते اور चुपचाप आगे बढ़ जाते।
आख़िरी वक़्त और ख़ात्मा
मीर साहब का आख़िरी वक़्त इन्तहाई कसमपुर्सी, तन्हाई और ग़ुर्बत में गुज़रा। रहने को एक छोटा सा टूटा-फूटा मकान था। ओढ़ने-बिछाने को फटी हुई चटाई के सिवा कुछ न था। बदन पर कपड़े भी तार-तार हो चुके थे, लेकिन मजाल है कि कभी उनकी पेशानी पर शिकन आई हो। जब भी घर से बाहर निकलते, उसी पुरानी दो-पल्ली टोपी को झाड़ कर सर पर रखते, अचकन के बटन बंद करते और तन कर चलते ताकि दुनिया उनकी बेबसी का मज़ाक़ न उड़ा सके।
आख़िरकार, दिल्ली का यह आख़िरी मय-नूश (कला का मतवाला) और लाडला दास्तान गो इस दुनिया-ए-फ़ानी से कूच कर गया। मीर साहब के इंतक़ाल के साथ ही हिन्दुस्तान से दास्तान गोई का वह अज़ीम और सदियों पुराना फ़न हमेशा के लिए दफ़्न हो गया। अब दिल्ली में सब कुछ है, मगर मीर बाक़िर अली की वह मीठी ज़बान और वह जादुई दास्तानें हमेशा के लिए ख़ामोश हो चुकी हैं।
(शाहिद अहमद देहलवी का लिखा यह मज़मून हमें याद दिलाता है कि तहज़ीबें जब बदलती हैं, तो अपने साथ कैसे-कैसे हीरों को मलबे में दफ़्न कर देती हैं।)
0 Comments