हजरत अमीर ख़ुसरो (1253–1325) और दास्तानगोई (मौखिक कहानियों सुनाने की भारतीय वा फ़ारसी पारंपरिक कला ) के बीच गहरा और ऐतिहासिक संबंध है। अमीर ख़ुसरो को मध्यकालीन भारत में दास्तानगोई की परंपरा की नींव रखने और इसे एक नई दिशा देने वाले अग्रणी व्यक्तित्वों में गिना जाता है।
अमीर ख़ुसरो और दास्तानगोई के इस संबंध को और गहराई से समझने के लिए हमें इसके साहित्यिक, भाषाई, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहलुओं को देखना होगा।
दास्तानगोई सिर्फ़ कहानी सुनाना नहीं है, बल्कि यह आवाज़ के उतार-चढ़ाव, अभिनय, भाषा के जादू और श्रोताओं को कहानी के माहौल में पूरी तरह से लीन कर देने की एक कला है। अमीर ख़ुसरो को इस कला का पहला महान भारतीय उस्ताद माना जाता है।
क़िस्सा चाहार दरवेश' (चार दरवेशों की कहानी) का संबंध:
अमीर ख़ुसरो और दास्तानगोई का नाम आते ही सबसे पहले 'क़िस्सा चाहार दरवेश' (चार फ़क़ीरों की कहानी) का ज़िक्र होता है।
लोकप्रिय परंपराओं और साहित्यिक इतिहास के अनुसार, दास्तानगोई की सबसे प्रसिद्ध दास्तानों में से एक 'क़िस्सा चाहार दरवेश' (जिसका बाद में मीर अम्मन ने 'बाग़-ओ-बहार' नाम से उर्दू में अनुवाद किया) का संबंध अमीर ख़ुसरो से जोड़ा जाता है।
ख्वाजा हसन निज़ामी की लिखी किताब 'निज़ामी बांसरी' में जिक्र है, कि जब ख़ुसरो के आध्यात्मिक गुरु हजरत निज़ामुद्दीन औलिया बीमार पड़े, तो अमीर ख़ुसरो ने उनका मन बहलाने और उन्हें सेहतमंद करने के लिए रोज़ाना ऐसी कहानियों की श्रृंखला बुनी, जिनमें रहस्य, रोमांच, अध्यात्म और प्रेम के तत्व थे।
इन कहानियों के प्रभाव से निज़ामुद्दीन औलिया ठीक हो गए और उन्होंने दुआ दी कि "जो भी इस क़िस्से को सुनेगा, वह बीमारी से शिफ़ा पाएगा।" यही क़िस्सा आगे चलकर दास्तानगोई की दुनिया का एक अहम मील का पत्थर बना। इस दास्तान में एक राजा (आज़ाद बख़्त) और चार दरवेशों की कहानियाँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। हर दरवेश अपनी-अपनी आपबीती और यात्राओं के क़िस्से सुनाता है। यह "कहानी के अंदर कहानी" (Frame Tale) का ढांचा दास्तानगोई की सबसे बड़ी पहचान है।
मीर अम्मन की प्रसिद्ध पुस्तक 'बाग़-ओ-बहार' (1803) की भूमिका (दीबाचा).फोर्ट विलियम कॉलेज, कोलकाता से प्रकाशित हुई इस ऐतिहासिक पुस्तक की शुरुआत में मीर अम्मन ने स्वयं लिखा है कि यह क़िस्सा मूल रूप से हज़रत अमीर ख़ुसरो द्वारा अपने पीर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया को उनकी अस्वस्थता के दौरान सुनाया गया था। इस दास्तान ने आगे चलकर उर्दू में दास्तानगोई परंपरा की बुनियाद रखी।
प्रो. रशीद हसन ख़ान द्वारा संपादित 'बाग़-ओ-बहार' के आलोचनात्मक संस्करणों और हाफ़िज़ महमूद शीरानी के शोध लेखों में इस ऐतिहासिक जनश्रुति (Tradition) का विस्तार से उल्लेख मिलता है।
फ़ारसी और भारतीय (हिंदवी) मौखिक परंपराओं का मेल.
ख़ुसरो ने फ़ारसी दास्तानगोई की 'तिलिस्म' और 'ऐयारी' की परंपरा को भारतीय लोककथाओं (जैसे कथा-सरित्सागर व पंचतंत्र) और स्थानीय भाषाओं के साथ मिलाया। इसके साथ ही, उन्होंने इस कला को केवल शाही दरबारों तक सीमित न रखकर जनमानस और सूफ़ी ख़ानक़ाहों का हिस्सा बनाया।
ख़ुसरो की अपनी कृतियाँ—'नूह सिपिहर' (1318) और 'ग़ुर्रत-उल-कमल' ख़ुसरो ने इन ग्रंथों की भूमिका में भारत की भाषाओं (हिंदवी) और यहाँ की समृद्ध कथा-वाचन व मौखिक साहित्य परंपरा की जमकर प्रशंसा की है। उन्होंने भारतीय जनभाषा और फ़ारसी कथा-शैली को मिलाकर एक नया भारतीय-फ़ारसी (साहब-ए-सबक-ए-हिंदी) ढांचा तैयार किया।
सबक-ए-हिंदी (Indo-Persian Style)उन्होंने दास्तानगोई के लिए जिस भाषा और शैली का चयन किया, उसे 'सबक-ए-हिंदी' कहा गया। इसमें भारतीय माहौल, मौसम, फूल-पौधे और यहाँ की तहज़ीब का खुलकर इस्तेमाल हुआ।
हश्त बिहिश्त' (आठ स्वर्ग): दास्तानगोई का उत्कृष्ट साहित्यिक रूप है l
ख़ुसरो की मसनवी 'हश्त बिहिश्त' (1298) को अगर पढ़ा जाए, तो यह लिखित रूप में दास्तानगोई का एक बेहतरीन दस्तावेज़ है।
इसमें बादशाह बहराम गोर के लिए सात अलग-अलग रंग के गुंबदों में सात शहज़ादियाँ सात दिन कहानियाँ सुनाती हैं (सोमवार को काली पोशाक में, मंगलवार को लाल पोशाक में आदि)।
इन सातों कहानियों की भाषा और बुनावट ऐसी है कि जब इन्हें पढ़ा या सुनाया जाए, तो सुनने वाले के सामने दृश्य जीवंत हो उठता है। शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी जैसे दास्तानगोई के आधुनिक विशेषज्ञों का मानना है कि 'हश्त बिहिश्त' ने ही बाद में उर्दू दास्तानों (जैसे दास्तान-ए-अमीर हमज़ा) के लिए ज़मीन तैयार की।
भाषा और संवाद-शैली (हिंदवी/रेख़्ता का प्रयोग)
दास्तानगोई दरबारी भाषा तक सीमित रहती तो आम जनता तक नहीं पहुँचती। ख़ुसरो ने दास्तानगोई के मौखिक तत्व के रूप में हिंदवी (जो आगे चलकर हिंदी/उर्दू बनी) को अपनाया।
दास्तानगोई में भाषा, लय और लफ़्फ़ाज़ी का विशेष महत्व होता है। ख़ुसरो ने अपनी रचनाओं में हिंदवी का प्रयोग कर कहानियों को जन-साधारण तक पहुँचाया। उनकी पहेलियाँ, मुकरियाँ और दोहे वास्तव में दास्तानगोई के ही छोटे मौखिक रूप हैं, जिनका इस्तेमाल दास्तानगो महफ़िल में श्रोताओं का ध्यान खींचने और अपनी प्रस्तुति में रंग भरने के लिए करते हैं।
एक थाल मोती से भरा, सबके सिर पर औंधा धरा...
दास्तानगोई में गद्य (Prose) भी गानों की तरह लयबद्ध बोला जाता है। ख़ुसरो ने अपनी गद्य रचनाओं में तुकबंदी और संगीत का ऐसा मिलाप किया कि दास्तानगो को उसे ज़बानी बोलने में आसानी होती थी।
अमीर ख़ुसरो की फ़ारसी मसनवी 'हश्त बिहिश्त' (1298) यह ग्रंथ प्रसिद्ध फ़ारसी कवि निज़ामी गंजवी के 'फ़्त पैकर' के उत्तर में लिखा गया था। इसमें सात शहज़ादियों द्वारा अलग-अलग दिनों में सुनाई गई सात कहानियों का ढांचा है। दास्तानगोई के इतिहासकार (जैसे शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी) इसे उर्दू-फ़ारसी दास्तानगोई की कथा-संरचना का मूल आधार मानते हैं।
सूफ़ी परंपरा और ख़ानक़ाहों में दास्तानगोई
अमीर ख़ुसरो ने दास्तानगोई का इस्तेमाल केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और नैतिक संदेश देने के लिए भी किया। ख़ानक़ाहों (सूफ़ी आश्रमों) में कहानियों और क़िस्सों के माध्यम से इंसानियत, प्रेम और ईश्वर-भक्ति का पाठ पढ़ाना उनकी शैली का मुख्य हिस्सा था।
ख़ानक़ाहों में सुनाई जाने वाली कहानियों में राजा, दरवेश, शहज़ादी या जादूगर केवल पात्र नहीं होते थे; वे आत्मा, ईश्वर, दुनिया की मोह-माया और आध्यात्मिक यात्रा के प्रतीक होते थे। दास्तानगोई के माध्यम से ख़ुसरो ने ऊँच-नीच, धर्म और जाति से परे उठकर प्रेम और सद्भाव का पाठ पढ़ाया। कहानियों के अंत में नैतिक शिक्षा देना इस परंपरा का मुख्य उद्देश्य बन गया।
फ़वायद-उल-फ़ुआद' (अमीर हसन सिजज़ी द्वारा संकलित निज़ामुद्दीन औलिया के मल्फ़ूज़ात/बातचीत) और 'सियार-उल-औलिया' (मीर ख़ुर्द)। इन ग्रंथों में चिश्ती सूफ़ी परंपरा में कहानियों, दृष्टांतों (Tales) और पहेलियों के ज़रिए नैतिक व आध्यात्मिक शिक्षा देने का विवरण है, जिसे ख़ुसरो अपनी मंडलियों और ख़ानक़ाहों में मौखिक रूप से प्रस्तुत करते थे।
दास्तानगोई के तत्वों का साहित्यिक प्रयोग
अमीर ख़ुसरो की प्रसिद्ध मसनवियाँ जैसे क़िरान-उस-सादैन, नूह सिपिहर, और हश्त बिहिश्त (आठ स्वर्ग) में दास्तानगोई के तमाम तत्व मौजूद हैं। 'हश्त बिहिश्त' में सात शहज़ादियों द्वारा सुनाई गई सात कहानियों का ढांचा सीधे तौर पर दास्तानगोई की बुनावट पर आधारित है।
निष्कर्ष, अमीर ख़ुसरो को दास्तानगोई का "शिल्पकार" कहा जा सकता है। उन्होंने फ़ारसी की जटिल दास्तान-शैली को भारतीय लोक-संस्कृति और जनभाषा से जोड़कर एक ऐसी मौखिक परंपरा शुरू की, जो आगे चलकर मुग़ल काल में अपने चरम पर पहुँची और 19वीं-20वीं सदी में लखनऊ और दिल्ली की गलियों में गूंजती रही। आज जब भारत में 'दास्तानगोई' का पुनर्जागरण (Revival) हो रहा है, तब भी अमीर ख़ुसरो की रचनाएँ और उनकी तकनीकें दास्तानगो (कहानी सुनाने वालों) के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत हैं।
आलेखकार: सैयद साहिल आग़ा
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